इज़राइल की गठबंधन राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है।
अरब राजनीतिक दलों ने पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़ेनकोट को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन दिया है।
120 सदस्यीय नेसेट (संसद) में 67 सांसदों का समर्थन मिलने के साथ ही वे अगली सरकार बनाने की दौड़ में मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से आगे निकल गए हैं।
जॉइंट लिस्ट और अरब नेतृत्व वाली रा’म पार्टी के समर्थन ने आइज़ेनकोट की स्थिति को मजबूत किया है।
यह समर्थन ऐसे समय में मिला है जब राष्ट्रपति आइज़ैक हर्ज़ोग विभिन्न दलों से परामर्श कर रहे हैं और उस नेता को सरकार गठन का आमंत्रण देंगे जिसे बहुमत जुटाने में सबसे सक्षम माना जाएगा।
हालांकि, गठबंधन सरकार का गठन अभी भी अनिश्चित बना हुआ है।
यदि आवश्यक बहुमत नहीं जुट पाया तो देश को एक और आम चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।
भारत के दृष्टिकोण से देखें तो इज़राइल की इस राजनीतिक हलचल से द्विपक्षीय संबंधों में किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं दिखाई देती।
पिछले दो दशकों में भारत-इज़राइल संबंध रक्षा, खुफिया सहयोग, आतंकवाद-रोधी प्रयासों, साइबर सुरक्षा, कृषि तथा उन्नत प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में विकसित होकर एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज यह संबंध किसी एक नेता के बजाय दोनों देशों के संस्थागत और रणनीतिक हितों पर आधारित हैं।
इसलिए सरकार बदलने की स्थिति में भी दोनों देशों के बीच चल रहे प्रमुख रक्षा कार्यक्रमों और प्रौद्योगिकी सहयोग पर कोई खास असर पड़ने की संभावना नहीं है।
आइज़ेनकोट की पृष्ठभूमि भी नीतिगत निरंतरता का संकेत देती है।
इज़राइल रक्षा बल (IDF) के पूर्व चीफ ऑफ जनरल स्टाफ रहे आइज़ेनकोट को राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य रणनीति के मामलों में अत्यंत अनुभवी नेता माना जाता है।
उनका उभार इस बात को भी दर्शाता है कि इज़राइली राजनीति में सुरक्षा संबंधी मुद्दे अब भी केंद्रीय महत्व रखते हैं।
यही वह क्षेत्र है जहां भारत और इज़राइल के रणनीतिक हितों में उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है।
भारत दुनिया में इज़राइली रक्षा प्रौद्योगिकी का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता देशों में से एक है।
भारतीय सशस्त्र बल ड्रोन, निगरानी प्रणालियों, मिसाइल रक्षा प्रणालियों के घटकों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरणों और सटीक निशाना साधने वाले हथियारों सहित अनेक इज़राइली तकनीकों का उपयोग करते हैं।
हाल के वर्षों में रक्षा औद्योगिक सहयोग और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी लगातार बढ़ा है।
यद्यपि अरब दलों का समर्थन इज़राइल की घरेलू राजनीति और गठबंधन वार्ताओं के स्वर को प्रभावित कर सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे देश की मूल सुरक्षा और विदेश नीति प्राथमिकताओं में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आएगा।
आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाली किसी भी सरकार को क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटना होगा और विदेशों में मजबूत रक्षा साझेदारियों को बनाए रखना होगा।
नई दिल्ली के लिए अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इज़राइल के साथ उसके संबंध अब कहीं अधिक परिपक्व और व्यापक हो चुके हैं।
यह रिश्ता केवल रक्षा खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि नवाचार, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों, स्टार्टअप सहयोग, जल प्रबंधन तथा भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसी संपर्क परियोजनाओं तक फैल चुका है।
इज़राइल एक बार फिर जटिल गठबंधन वार्ताओं के दौर में प्रवेश कर रहा है और भारत का रणनीतिक समुदाय इन घटनाक्रमों पर करीबी नजर बनाए रखेगा।
फिर भी व्यापक आकलन यही है कि यरुशलम में अंततः चाहे कोई भी प्रधानमंत्री बने, भारत-इज़राइल साझेदारी की बुनियाद इतनी मजबूत हो चुकी है कि रक्षा और रणनीतिक सहयोग की निरंतरता बनी रहेगी।







