साल 2026 में ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े दो अहम घटनाक्रम सामने आए हैं—एक विधायी स्तर पर और दूसरा प्रशासनिक स्तर पर।
इन्हीं के चलते यह जिज्ञासा बनी हुई है कि राष्ट्रगीत में कुल कितने छंद हैं, संपूर्ण गीत गाना जरूरी है या नहीं, और नए कानून में असल में किस तरह की सजा तय की गई है।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की मूल रचना ‘वंदे मातरम्’ के प्रामाणिक स्वरूप में कुल छह छंद शामिल हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जो आधिकारिक रिकॉर्डिंग जारी की है, उसकी अवधि इन सब छंदों को गाने की करीब 3 मिनट 10 सेकंड है।
अभी तक सरकारी और सार्वजनिक समारोहों में परंपरागत रूप से केवल शुरुआती दो छंद ही गाए जाते आए हैं। इसके पीछे एक ऐतिहासिक कारण है—वर्ष 1937 में कांग्रेस पार्टी ने यह तय किया था कि आगे के छंदों में मौजूद धार्मिक संदर्भों पर आपत्तियों के चलते केवल शुरुआती दो छंदों को ही राष्ट्रगीत के तौर पर प्रस्तुत किया जाएगा।
गृह मंत्रालय के नए निर्देशों को समझने की जरूरत है ।गृह मंत्रालय ने इसी साल वंदे मातरम् की प्रस्तुति के लिए एक नया औपचारिक प्रोटोकॉल जारी किया, जिसमें छह छंदों वाले पूरे आधिकारिक संस्करण को मानक के रूप में तय किया गया।
अब किसी सरकारी समारोह में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान—दोनों प्रस्तुत करने हों, तो क्रम में वंदे मातरम् पहले और जन गण मन उसके बाद बजाया जाएगा। इस आदेश में अलग-अलग औपचारिक मौकों और प्रस्तुतिकरण की प्रक्रिया का विस्तृत उल्लेख भी किया गया है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि गृह मंत्रालय का यह प्रोटोकॉल और आपराधिक कानून, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। यह आदेश केवल सरकारी और औपचारिक कार्यक्रमों में गीत की प्रस्तुति-प्रक्रिया तय करता है।
संसद के बीते सत्र में ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026’ पारित करके 1971 के मूल कानून में संशोधन किया। इस बदलाव का उद्देश्य वंदे मातरम् को भी वही कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है, जो अब तक केवल राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को हासिल थी। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद यह संशोधन अब औपचारिक रूप से कानून बन चुका है।
यहां एक स्पष्ट तथ्य समझना जरूरी है—संशोधित कानून में सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य नहीं बनाया गया है।
नए कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन में रुकावट डालता है या उसे गा रही किसी सभा में बाधा उत्पन्न करता है, तो यह दंडनीय अपराध माना जाएगा।
इसके लिए तीन वर्ष तक के कारावास, जुर्माने या दोनों की सजा का प्रावधान रखा गया है। यदि कोई व्यक्ति दोबारा यह अपराध करता है, तो न्यूनतम एक वर्ष की सजा लागू हो सकती है।
जहां तक सभी के लिए सारे छह छंदों को गाने का सवाल है उसमें स्थिति को स्पष्ट करना भी जरूरी है।
नए कानून का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि हर नागरिक को हर स्थिति में अनिवार्य रूप से सभी छह छंद गाने होंगे। कानून का मूल उद्देश्य केवल जानबूझकर गायन को रोकने या उसमें विघ्न डालने की कार्रवाई को दंडनीय बनाना है।
दूसरी तरफ, गृह मंत्रालय का आदेश केवल सरकारी और औपचारिक आयोजनों के लिए प्रस्तुतिकरण का ढांचा निर्धारित करता है। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा कि “छह छंद न गाने पर तीन साल की सजा हो सकती है।”
2026 तक की स्थिति यह है कि वंदे मातरम् को छह छंदों वाले आधिकारिक संस्करण के साथ एक औपचारिक प्रोटोकॉल तो मिल गया है, और नए कानून ने इसके सम्मान को कानूनी कवच भी प्रदान किया है। लेकिन कानून का दंडात्मक प्रावधान सीधे तौर पर किसी भी नागरिक पर छह छंद गाने की बाध्यता नहीं थोपता।
(रविन्द्र सिंह श्योराण, स्वतंत्र पत्रकार है जो पत्रकारिता में पच्चीस साल का अनुभव रखते हैं।)







