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छोटे देश पर्यावरण के प्रति अधिक सजग

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न्यूज़गेट प्रैस नेटवर्क

महेंद्र पाण्डेय

नई दिल्ली। दुनिया के सभी बड़े देश चरम पूंजीवादी व्यवस्था की चपेट में हैं, और पूंजीवाद पर्यावरण के विनाश पर ही पनपता है। जाहिर है इन देशों में, जिनमें भारत भी शामिल है, पर्यावरण संरक्षण के लिए नियम-क़ानून तो बहुत हैं, पर यह सब दिखावे के लिए है और वास्तविकता में आर्थिक विकास के नाम पर पर्यावरण विनाश की खुली छूट है। दूसरी तरफ अनेक छोटे देश हैं जहां पर्यावरण पर केवल हंगामा नहीं किया जा रहा, बल्कि काम भी किया जा रहा है। इन देशों में पर्यावरण संरक्षण के क़ानून केवल दिखावे के लिए नहीं हैं बल्कि इनका असर भी दिखने लगा है।

ग्रीनलैंड में हाल में ही चुनाव संपन्न हुए हैं, और इन चुनावों में इस बार एक ही मुद्दा था, पर्यावरण संरक्षण। पूरे मानव इतिहास में संभवतया यह पहला चुनाव होगा जो केवल पर्यावरण के मुद्दे पर लड़ा गया। ग्रीनलैंड में बर्फ की चादर लगातार कम हो रही है, और इसके घटने की दर इस समय पिछले 12000 वर्षों में सर्वाधिक आंकी गयी है। पिछले कुछ वर्षों से ग्रीनलैंड की राजनीति के केंद्र में एक अन्तरराष्ट्रीय खनन परियोजना थी, जिसे सत्ता पक्ष, यानि सेंटर लेफ्ट फॉरवर्ड पार्टी स्वीकृति देना चाहती थी, पर लगभग सभी अन्य विपक्षी पार्टियां इसका पुरजोर विरोध कर रही थीं, और यही इस चुनाव का एकलौता मुद्दा भी था।

यह खनन परियोजना ऑस्ट्रेलिया स्थित, चीन के मालिकाना हक़ वाली, ग्रीनलैंड मिनरल्स नामक कंपनी की है। क्वानेफ्जेल्ड खनन परियोजना से यूरेनिंयम और रेयर अर्थ का खनन करना था। रेयर अर्थ नामक खनिज का उपयोग लगभग सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में और सौर ऊर्जा परियोजनाओं में किया जाता है| दुनिया में जितना रेयर अर्थ उपलब्ध है, उसमें से 90 प्रतिशत का खनन चीन द्वारा ही किया जाता है। चीन के बाहर उपलब्ध रेयर अर्थ के ज्ञात भंडारों में से सबसे बड़ा भण्डार ग्रीनलैंड में ही है, जिसका खनन किया जाने का प्रस्ताव था इसलिए इस पर पूरी दुनिया की निगाह थी। इस खनन परियोजना से बहुत बड़े क्षेत्र का पर्यावरण प्रभावित होने वाला था।

ग्रीनलैंड में वामपंथी विचारधारा वाली कम्युनिटी ऑफ़ पीपल पार्टी, जो सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी थी, ने चुनावों में इस परियोजना के विरोध को ही एकमात्र मुद्दा बनाया था। इस मुद्दे को वहां की जनता ने पसंद किया और चुनावों में 12 सीटों और 37 प्रतिशत वोट के साथ कम्युनिटी ऑफ़ पीपल पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी। हालांकि 31 सीटों वाली संसद में यह पार्टी अकेले सरकार नहीं बना सकती, पर अनेक छोटे दलों ने इसे समर्थन देने का ऐलान किया है।

ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, और दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। यह आर्कटिक और अटलांटिक महासागरों के बीच स्थित है और उत्तरी ध्रुव के बहुत पास है। इसका अधिकतर हिस्सा बर्फ से ढका रहता है। ग्रीनलैंड का पूरा क्षेत्रफल लगभग 22 लाख वर्ग किलोमीटर है, और आबादी महज 56225 है। ग्रीनलैंड के लिए पर्यावरण संरक्षण कितना बड़ा मुद्दा होगा, इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि वर्ष 1979 से लगभग लगातार सत्ता में रहने वाली सेंटर लेफ्ट फॉरवर्ड पार्टी को इस बार इसी मुद्दे पर हार का सामना करना पड़ा। इस पार्टी को चुनावों में 29 प्रतिशत वोट और 10 सीटें मिलीं, पर कोई भी विपक्षी पार्टी इसके साथ सहयोग करने को तैयार नहीं है। पर्यावरण को मुद्दा बनाने वाली और चुनावों में सबसे अधिक सीटें हासिल करने वाली कम्युनिटी ऑफ़ पीपल पार्टी के अध्यक्ष, 34 वर्षीय म्यूट बौरूप एगेदा के अनुसार यह ग्रीनलैंड के पर्यावरण और जनता की जीत है।

प्रशांत महासागर में स्थित फिजी भी इन दिनों पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रियता के लिए चर्चा में है। फिजी लगभग 300 द्वीपों का समूह है, जिनमें से 100 द्वीपों पर आबादी है। यहाँ का क्षेत्रफल 18272 वर्ग किलोमीटर है और आबादी महज 90 लाख है। फिजी के एक निर्जन द्वीप, मलोला, पर एक चीनी कंपनी फ्रीसौल रियल एस्टेट ने वहां के सबसे बड़े हॉलिडे रिसॉर्ट और फिजी के पहले कैसिनो के निर्माण के लिए आवेदन किया था और उसे अनुमति मिल गयी थी और पर्यावरण स्वीकृति भी दे दी गयी थी। पर्यावरण स्वीकृति के अनुसार कंपनी को किसी भी तरह से कोरल रीफ, मैन्ग्रोव वनों और सागर तट को नुकसान नहीं पहुंचाना था।

कंपनी ने जब निर्माण शुरू किया तब पर्यावरण स्वीकृति के निर्देशों की खूब अवहेलना की। तट के सघन कोरल क्षेत्र को बर्बाद कर उससे नावों को तट पर पहुँचाने का मार्ग बना दिया, जिससे निर्माण सामग्री सीधे तट तक पहुँच सके| किनारे के मैन्ग्रोव वनों को भी काट डाला गया और नष्ट किये गए कोरल को किनारे पर डाल दिया गया। परियोजना पर काम कर रहे श्रमिकों की बस्तियों से निकलने वाला गन्दा पानी सीधे महासागर में मिलाया जा रहा था। इस नज़ारे को दो ऑस्ट्रेलियाई पर्यटकों, नव्रिन फॉक्स और वुडी जैक ने अपने कैमरे में कैद किया और एक स्थानीय नागरिक, जोना रातू की मदद से वहां के पर्यावरण विभाग में शिकायत दर्ज कराई। बाद में उन्होंने स्थानीय अदालत में कंपनी फ्रीसौल रियल एस्टेट के विरुद्ध मुक़दमा दायर कर दिया। मुकदमे की पहली सुनवाई के बाद ही इस परियोजना के लिए पर्यावरण स्वीकृति को अमान्य करार दिया गया और सभी निर्माण कार्यों को तत्काल रोक दिया गया। अगली सुनवाई में कंपनी को पर्यावरण स्वीकृति के निर्देशों की अवहेलना और पर्यावरण विनाश का दोषी करार दिया गया, और कंपनी का फिजी में काम करने का लाइसेंस रद्द कर दिया गया। मई में होने वाली अगली सुनवाई में इस मामले में सजा और आर्थिक दंड सुनाया जाने वाला है। आर्थिक दंड से उस द्वीप और आसपास के क्षेत्र को पहले जैसा बनाया जाएगा।

प्रशांत महासागर के देशों में इस मुकदमे को लेकर खासी दिलचस्पी थी, क्योंकि सभी देश अपने पर्यावरण कानूनों को परखना चाहते थे और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी साबित करना चाहते थे। सभी देश देखना चाहते थे कि उनके पर्यावरण संरक्षण से सम्बंधित क़ानून पर्यावरण विनाश करने वालों को सजा दिलाने में सक्षम हैं या नहीं। फिजी के प्रधानमंत्री फ्रैंक बैनीमरामा जलवायु परिवर्तन रोकने के मुद्दों पर अन्तराष्ट्रीय स्तर पर खासे सक्रिय रहे हैं, और वर्ष 2017 में कान्फ्रेंस ऑफ़ पार्टीज के 23वें दौर के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

फिजी और ग्रीनलैंड बहुत छोटे देश हैं, पर अपने पर्यावरण के प्रति अब सजग हो रहे हैं। दोनों ही देशों में पर्यावरण विनाश का काम चीन की कम्पनियां कर रही थीं, पर चीन ऐसा करने वाला अकेला देश नहीं है। पूंजीवाद से पनपा उपभोक्तावाद पर्यावरण का विनाश पूरी दुनिया में तेजी से कर रहा है। अब बड़े और विकसित देश अपने यहाँ के प्रदूषणकारी उद्योगों को भारत समेत दूसरे विकासशील देशों में या फिर अल्पविकसित देशों में स्थापित कर रहे हैं। भारत लगातार ऐसे उद्योगों का स्वागत करता रहा है और इसे विकास का पैमाना बताता रहा है, पर अनेक छोटे देश अब विकसित देशों की चाल समझ गए हैं और पर्यावरण विनाश की हकीकत जानने लगे हैं। वे अब अपने यहाँ बाहर के उद्योगों को प्रतिबंधित करने लगे हैं। यहाँ तक की विकसित देशों का कचरा भी उन्हीं देशों को वापस भेजने लगे हैं। (आभार – समय की चर्चा)

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