न्यूज़गेट प्रैस नेटवर्क

महेंद्र पाण्डेय

प्लास्टिक के उत्पादन से लेकर उसके कचरे के निपटारे तक को पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते की तैयारी शुरू हो गई है। इसका मसौदा और इसके लिए पैसे के इंतजाम की प्रक्रिया वर्ष 2024 तक पूरी कर ली जायेगी। यह समझौता जलवायु परिवर्तन नियंत्रण को लेकर 176 देशों के पेरिस समझौते की तरह होगा, सभी देश जिसे मानने को बाध्य होंगे।

पहली मार्च को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण अधिवेशन में भारत समेत दुनिया के 175 देशों ने प्लास्टिक कचरे की समस्या से निपटने की गरज से इस समझौते के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये। इससे एक महीने पहले केन्या के नैरोबी स्थित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने ऐलान किया था कि संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण अधिवेशन के पांचवें सत्र में प्लास्टिक कचरे की समस्या पर गहन चर्चा की जायेगी।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की प्रमुख इंगेर एंडरसन के अनुसार यह समझौता जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने से सम्बंधित 2015 के पेरिस समझौते के बाद पर्यावरण संरक्षण के मामले में सबसे बड़ा समझौता होगा जो कि भविष्य की पीढ़ियों के जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए एक बीमा की तरह होगा। अधिवेशन के पांचवें सत्र के अध्यक्ष और नॉर्वे के पर्यावरण मंत्री एप्सें बर्थ एइडे ने कहा कि प्लास्टिक कचरे की समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि रूस और यूक्रेन युद्ध के बीच इस समझौता का फैसला किया गया है।

पर्यावरण वैज्ञानिक इस दौर को “मानव युग” कहते हैं, क्योंकि पृथ्वी पर हर जगह मनुष्य पहुंच चुका है। मनुष्य का जो उत्पाद सही मायने में सर्वव्यापी है, वह है प्लास्टिक कचरा। इसका प्रभाव इस कदर बढ़ चुका है कि जैसे विकास क्रम को ताम्बा युग और लौह युग में बाँटा जाता है, उसी तरह मानो हम प्लास्टिक युग में रह रहे हैं। प्लास्टिक पर सबसे अधिक चर्चा महासागरों के सन्दर्भ में की गयी है जिनमें हर वर्ष एक करोड़ बीस लाख प्लास्टिक कचरा गिरता है। अब तो यह माउंट एवेरेस्ट और पृथ्वी के दोनों ध्रुवों पर, हवा में, पानी में, यहाँ तक कि खाद्य पदार्थों में भी मिलने लगा है। प्लास्टिक के पांच मिलीमीटर से छोटे आकार के टुकड़े, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है, और 0.001 मिलीमीटर से छोटे टुकडे जिन्हें नैनोप्लास्टिक कहा जाता है – आज पृथ्वी के हर हिस्से में मिलते हैं, हर पशु-पक्षी और मानव के शरीर में मिलते हैं और इनकी सांद्रता वैज्ञानिकों के अनुमानों से कहीं अधिक है।

पार्टिकल एंड फाइबर टेक्नोलॉजी जर्नल में छपे एक शोधपत्र के मुताबिक गर्भवती मादा चूहों के फेफड़े से उसके गर्भ में पल रहे शिशु के ह्रदय, मस्तिष्क आदि अंगों तक माइक्रोप्लास्टिक आसानी से पहुँच जाता है। रुत्गेर्स यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर फोएबे स्ताप्लेतों की अगुवाई में हुए इस अध्ययन के अनुसार जिन गर्भस्थ शिशुओं में माइक्रोप्लास्टिक या नैनोप्लास्टिक पहुंचता है, उनका वजन कम रहता है। अध्ययन के बीच जब गर्भवती मादा चूहे को माइक्रोप्लास्टिक के माहौल में रखा गया तब महज 90 मिनट में यह प्लास्टिक प्लेसेंटा तक पहुँच गया।

वर्ष 2019 और 2020 के दौरान किये गए अनेक अध्ययनों में गर्भवती महिलाओं के प्लेसेंटा में और गर्भस्थ शिशुओं में नैनोप्लास्टिक पाए गए। अक्टूबर 2020 में डबलिन के ट्रिनिटी कॉलेज के वैज्ञानिकों के एक शोध के अनुसार जिन शिशुओं को प्लास्टिक की बोतल से दूध पिलाया जाता है, उनके शरीर में दूध के साथ लगातार नैनोप्लास्टिक जाता है। प्लास्टिक का कचरा महासागर के जीवों से लेकर गायों के पेट तक पहुँच रहा है। वर्ष 2019 में प्रकाशित एक शोधपत्र बताता है कि एक औसत मनुष्य के शरीर में भोजन और सांस के साथ प्रतिवर्ष लगभग सवा लाख प्लास्टिक के टुकड़े पहुंच रहे हैं। इस शोधपत्र के मुख्य लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ़ विक्टोरिया के डॉ किएरन कॉक्स हैं। इस दल ने खाद्यों में मौजूद प्लास्टिक से सम्बंधित अनेक शोधपत्रों के अध्ययन, हवा में प्लास्टिक की सांद्रता और मनुष्य के प्रतिदिन के औसत भोजन के आधार पर बताया कि उम्र और लिंग के आधार पर औसत मनुष्य प्रतिवर्ष 74000 से 121000 के बीच प्लास्टिक के टुकड़े ग्रहण करता है। एक सामान्य मनुष्य प्रतिदिन प्लास्टिक के 142 टुकड़े खाद्य पदार्थों के साथ और 170 टुकड़े सांस के साथ ग्रहण कर रहा है। केवल बोतलबंद पानी पीने से ही उसके शरीर में प्रतिवर्ष 90000 प्लास्टिक के अतिरिक्त टुकड़े जाते हैं।

प्लास्टिक के नुकसान यहीं तक सीमित नहीं हैं। नए शोध इसे तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन से भी जोड़ने लगे हैं। सेंटर फॉर इंटरनेशनल एनवायर्नमेंटल लॉ नामक संस्था के कराये एक अध्ययन के अनुसार केवल एक बार इस्तेमाल किया जा सकने वाला प्लास्टिक जलवायु परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभा रहा है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक दुनिया में कुल कार्बन उत्सर्जन में से 13 प्रतिशत से अधिक का योगदान प्लास्टिक के उत्पादन, उपयोग और उसके कचरे का होगा, जो लगभग 615 कोयले से चलने वाले ताप बिजलीघरों जितना होगा। इस संस्था के अनुसार प्लास्टिक के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों में इसके तापमान वृद्धि में योगदान को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

विश्व में 20 नदियाँ ऐसी हैं जिनसे महासागरों में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक पहुंचता है। इनमें पहले स्थान पर चीन की यांग्तज़े नदी है, जिससे प्रतिवर्ष 333000 टन प्लास्टिक महासागरों तक पहुंचता है। दूसरे स्थान पर गंगा है जिससे 115000 टन प्लास्टिक प्रतिवर्ष जाता है। तीसरे नंबर पर चीन की क्सी, चौथे पर भी चीन की ही हुंग्पू और पांचवें पर नाइजीरिया और कैमरून में बहने वाली क्रॉस नदी है।

इन बीस नदियों में से छह चीन में, चार इंडोनेशिया में और तीन नाइजीरिया में हैं। इनके अलावा एक-एक नदी भारत, ब्राज़ील, फिलीपींस, म्यांमार, थाईलैंड, कोलंबिया और ताइवान में है। स्पष्ट है कि महासागरों तक प्लास्टिक पहुंचाने वाली अधिकतर नदियाँ एशिया में हैं। वर्ष 2014 में वैज्ञानिकों के एक दल ने अनुमान लगाया था कि महासागरों में 5.25 ट्रिलियन प्लास्टिक के टुकडे हैं, जिनका वजन 25 लाख टन है। पर नए आकलन बताते हैं की महासागरों में प्लास्टिक की मात्रा इससे लगभग दस गुना अधिक है। वर्ष 2019 के आकलन के अनुसार महासागरों का प्लास्टिक वहीं नहीं रहता, बल्कि इसमें से 136000 टन प्लास्टिक हर वर्ष वायुमंडल में मिल जाता है। माहासागारों में प्लास्टिक की सघनता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि कुछ जगहों पर प्लास्टिक का घनत्व 19 लाख टुकडे प्रति वर्ग मीटर है।

प्लास्टिक के छोटे टुकड़े जो हवा में तैरते हैं और सांस के साथ हमारे अन्दर जाते हैं, उन पर खतरनाक रसायनों, हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस का जमावड़ा भी हो सकता है। कुछ मामलों में इसके असर से कैंसर भी हो सकता है। प्लास्टिक का मानव शरीर में आकलन कठिन काम है। शायद इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन लगातार बताता है कि प्लास्टिक हर जगह है, मानव अंगों में भी है, पर इससे कोई नुकसान नहीं होता। वर्ष 2020 में एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शरीर में प्लास्टिक की उपस्थिति जानने का एक नया तरीका खोजा। इस दल की अगुवाई कर रहे वरुण कलाकार के अनुसार अधिकतर प्लास्टिक उत्पादन में बिसफिनॉल ए नामक रसायन का उपयोग होता है। यदि इस रसायन को मानव ऊतकों में मापा जाए तो इससे प्लास्टिक का पता चल सकता है। इस दल ने मानव ऊतकों के जितने भी नमूने लिए उन सब में यह रसायन पाया गया। अमेरिका की एनवायर्नमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी के मुताबिक बिसफिनॉल ए के असर से विकास और प्रजनन सम्बंधी प्रक्रियाएं बाधित होती हैं।

वैज्ञानिक सीधे तौर पर तो नहीं बताते, पर यदि उनके अनुसार माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक पर वायरस और बैक्टीरिया पनप सकते हैं, तो जाहिर है कोविड-19 के वायरस भी इनके द्वारा फ़ैल सकते हैं। वैज्ञानिक पहले ही बता चुके हैं कि यह वायरस हवा में सक्रिय रहता है और प्लास्टिक की सतह पर आठ घंटे से अधिक समय तक सक्रिय रहता है। वर्ष 1950 तक पूरी दुनिया में 20 लाख टन प्लास्टिक का प्रतिवर्ष उत्पादन होता था जो 2017 तक बढ़ कर 40 करोड़ टन पर पहुँच गया। हर साल दुनिया से 30 करोड़ टन प्लास्टिक का कचरा पैदा होता है। यह पृथ्वी के सभी मनुष्यों के सम्मिलित वजन के बराबर है। इसमें से प्रतिवर्ष 1.2 करोड़ टन कचरा महासागरों में पहुँच जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2040 तक महासागरों में पहुँचने वाले इस कचरे की मात्रा चार गुना बढ़ जायेगी। प्लास्टिक के कचरे को रीसाइकिल किया जा सकता है, पर संयुक्त राष्ट्र की 2021 की एक रिपोर्ट के हिसाब से दुनिया में उत्पन्न कुल प्लास्टिक कचरे में से महज नौ प्रतिशत को ही रीसाइकिल किया जाता ह।