‘टाइम-लूप’ में फंसे लोग

    https://hindi.newsgate.press/

    सुशील कुमार सिंह

    वह समय से जूझ रही थी। ‘टाइम लूप’ यानी ‘समय-चक्र’ में फंस गई थी। उसके लिए हर दिन एक सा था, हर नया दिन 18 नवंबर था। वह सुबह सोकर उठती तो फिर वही तारीख।

    उसे पहले से पता रहता कि कब क्या होगा। कब चिड़ियों का झुंड चहचहाएगा या कब बारिश होगी या कब वह खुद उठ कर किसी काम से कहां तक जाएगी। पूरे दिन उसके किए का कोई अर्थ नहीं था, क्य़ोंकि अगली सुबह फिर वही सब शुरू होना था।

    दुनिया में उसका कोई योगदान नहीं था। सब आगे बढ़ रहे थे और वह पिछड़ती जा रही थी। उसकी समस्या कोई नहीं समझ सकता था। उसका पति भी नहीं। और तब उसे ऐसे अन्य लोग मिले जो स्वयं भी उसी तारीख में फंसे हुए थे और उसी ‘टाइम-लूप’ में जीवन गुज़ार रहे थे।

      यह डेनिश लेखिका सॉल्वेज बैले के उपन्यास ‘ऑन द कैल्कुलेशन ऑफ वॉल्यूम’ की कहानी है। सात खंडों में लिखे जा रहे इस उपन्यास के चौथे भाग का इंग्लिश अनुवाद इसी 26 अप्रैल को रिलीज़ हुआ। हालांकि बैले छह खंड लिख चुकी हैं, लेकिन अंग्रेज़ी अनुवाद चार का ही हुआ है। इसलिए ज़्यादातर दुनिया इस उपन्यास की इतनी ही कहानी तक पहुंची है। 

      गरीबी और बेरोज़गारी के शिकार लोग क्या ऐसी ही अवस्था से नहीं गुज़र रहे? इन लोगों के लिए भी हर दिन एक सा है और प्रतिदिन वे भी पीछे छूटते जा रहे हैं।

    उन्हें भी लगता होगा कि जाने कब यह तारीख़ बदलेगी, जिसे महंगाई ने और ज़्यादा दूभर बना दिया है।

    जिन्हें हम जेन-ज़ी और मिलेनियल कहते हैं वे तो इस एकरस ज़िंदगी से और भी जल्दी उकता चुके हैं। उनमें अनेक लोगों की आस प्रतियोगी परीक्षाओं पर टिकी होती है। मगर वहां भी पेपर लीक होते हैं तो यह ऊब और विकराल हो जाती है। ऐसा हर हादसा उन्हें ज़्यादा चोटिल और ज़्यादा व्यग्र बनाता है। पिछले शनिवार हमने दिल्ली के जंतर-मंतर पर और इस गुरुवार पुणे में जो जमावड़ा देखा, क्या यह समय के उसी दुष्चक्र में फंसे लोगों की कसमसाहट है? क्या वे अपने जैसे लोगों के समूह में आकर सहज अनुभव कर रहे थे?  

       इस उपन्यास की नायिका तारा सेल्टर फ्रांस के एक गाँव में पति थॉमस के साथ रहती है। पति-पत्नी मिल कर पुरानी किताबों की दुकान चलाते हैं। एक रोज़ अचानक उसे लगा कि यह तो वही दिन है जो पिछले दिन था। पहले वह इसका रहस्य भेदने की कोशिश करती है। वह हर दिन को अलग-अलग तरीकों से जीती है, नई-नई जगहों की यात्रा करती है, लेकिन कुछ नहीं बदलता। हार कर वह स्वीकार लेती है कि वह हमेशा के लिए 18 नवंबर में कैद हो गई है।

       इस स्वीकारोक्ति का सबसे पहला मतलब इस अहसास को गंवाना था कि वह समय के समानांतर चल रही है। इसका अर्थ उसकी स्वाभाविक रफ़्तार और निश्चिंतता पर उसकी निरर्थकता का हावी होते जाना भी था। एक ऐसी स्थिति जहां अपनी ही निगाह में अपना कोई सम्मान या कोई महत्व नहीं बचता। ऐसे जीवन का क्या अर्थ है?

      ऐसे में उसे वे लोग मिलते हैं जो उस जैसी ही समस्या के शिकार हैं। यानी वे भी उसी ‘टाइम-लूप’ में फंसे हुए हैं और उसी की तरह 18 नवंबर से बाहर निकलने को छटपटा रहे हैं। उन सबको कोई रास्ता चाहिए था। सबका उद्देश्य एक था। और यह समानता उन्हें जोड़ रही थी।

      वे एक शहर के बाहरी इलाके की एक पुरानी इमारत में अपना अनौपचारिक हेडक्वार्टर बनाते हैं। यहाँ वे एक बेहतर भविष्य के लिए अपनी भाषा भी गढ़ते हैं और अपने अस्तित्व का अर्थ समझने का प्रयास करते हैं। धीरे-धीरे यह छोटा सा समूह एक बड़े और संगठित समुदाय में तब्दील होने लगता है। मानो वे सब एक नया समाज बनाना चाहते हैं। दोहराते हुए समय में, जो कि उनके साथ बीत रहा था, वे मिल कर अपनी अलग दुनिया बनाने की कोशिश करते हैं।

      उनके कथित हेडक्वार्टर के लोहे के गेट पर अक्सर कोई नया व्यक्ति दस्तक देता है। ज़ाहिर है कि वह भी समय-चक्र से परेशान होगा।  पूछताछ के बाद उन्हें भीतर आने दिया जाता है। समुदाय बढ़ता चला जाता है। वे लकड़ी काटना, भोजन इकट्ठा करना जैसी जिम्मेदारियां आपस में बांटते हैं और तय करते हैं कि इस ‘दोहराते हुए समय’ का क्या इस्तेमाल करें। उनके हिस्से तो यही समय आया है।

       उनके लिए सामान्य सप्ताह या महीने के कोई मायने नहीं रह गए। इसलिए उन्हें यह भी ज़रूरी लगा कि वे समय को मापने के नए नाम सोचें। बाकायदा इन मुद्दों पर उनमें बहस होती है। असल में उनकी मुराद इस बात से थी कि जब कोई कल न रहे, यानी जब कोई भविष्य न रहे, तो जीवन का क्या अर्थ है।

       इस बहस में कई बातें सामने आती हैं। जैसे आदमी ही है जो अपने समय को अर्थ देता है। या फिर, अगर किसी को भविष्य चाहिए तो वह उसे स्वयं बनाना होगा। इस निष्कर्ष पर यह नया समुदाय काफ़ी देर में पहुंच पाया।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here