न्यूज़गेट प्रैस नेटवर्क
अरविंद कुमार सिंह
‘उर्रुवार उलगत्तार्क आणिअ: ताट्राद, एर्रुवारै एल्लाम् पोरुत्त’
कील के दक्षिण भारत के महान संत कवि, थिरुवल्लुवर ने कहा था कि किसान, धुरी की समान है जो पूरे विश्व को संभालकर रखता है। वह उन सबके भार को भी वहन करता है जो खेती नहीं कर सकते।
दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलित किसानों का धरना 14 जून को 200 दिन और 26 जून को सात महीना कर गया।
इतने लंबे आंदोलन में अब तक 500 से अधिक किसानों की मौत हो चुकी है। दिल्ली की सरहदों से कहीं आगे जाकर हरित क्रांति वाले इलाकों से होते हुए देश के प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों तक यह आंदोलन असर दिखा रहा है। कड़ाके की ठंड, तेज आंधी-तूफान, चिलचिलाती गर्मी और बारिश सभी कुछ किसानों ने झेल लिया।
कोरोना काल में बनाए गए तीन कृषि कानूनों को रद्द करने के साथ एमएसपी पर खरीद की गारंटी का नया कानून बनाने की मांग को लेकर चल रहे यह आंदोलन आज ऐतिहासिक मोड़ पर है और किसानों के साथ सरकार की धैर्य की परीक्षा भी ले रहा है। लेकिन इस आंदोलन से उठे सवालों को झुठलाने के लिए सरकार ने इस बीच में कुछ अहम कदम उठाए हैं, जिसमें अनाजों की खरीद का बढ़ना काफी अहम उपलब्धि बताते हुए इसे काफी प्रचारित किया जा रहा है।
आंदोलन के असर के कारण ही पहली बार सरकार ने खरीफ और रबी दो सीजन में अनाजों की खरीद के आंकड़ों को रोज जारी किया। 18 जून 2021 को खाद्य मंत्रालय ने रबी मौसम में हुई खरीद का आंकड़ा जारी करते हुए दावा किया कि अब तक उच्चतम स्तर पर 431.12 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है।
बीते सीजन यानि 2020-21 में 389.92 लाख टन गेहूं खरीदा गया था। गेहूं की खरीद से कुल 48.75 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं और उनको इसके एवज में 85,146 करोड़ रुपये से अधिक की राशि मिली।
गेहूं की तुलना में धान की खरीद काफी अच्छी रही। रबी और खरीफ दोनों मौसम में धान पैदा होता है। लेकिन अधिकतम उत्पादन और खरीद खरीफ में ही होती है। इस बार सीजन को मिला कर 839.41 लाख टन से अधिक धान खरीदा गया। इसमें बीते खरीफ सीजन में खरीदा गया 707.67 लाख टन और इस बार के रबी सीजन में खरीदा गया 131.74 लाख टन धान शामिल है।
दोनों सीजन की धान खरीद से सबसे अधिक एक करोड़ 24 लाख किसान लाभान्वित हुए, जिनको धान के बदले 1,58,479 करोड़ रुपये से अधिक की राशि मिली।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि दोनों सीजन में खरीद काफी बढ़ी है। इस बार सबसे अधिक गेहूं 132.1 लाख टन पंजाब और 128.08 लाख टन मध्य प्रदेश से खरीदा गया।
हरियाणा 84.64 लाख टन खरीद के साथ तीसरे नंबर पर औऱ उत्तर प्रदेश 55.64 लाख टन अनाज खरीद के साथ चौथे नंबर पर रहा। राजस्थान से 22.5 लाख टन और अन्य राज्यों से 7.87 लाख टन गेहूं खरीद हुई।
सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में 2016-17 के मुकाबले सात गुना अधिक और गेहूं खरीद को राज्य सरकार अगर विशिष्ट उपलब्धि मान रही है तो गलत नहीं है। लेकिन यह भी देखना होगा कि कुल गेहूं उत्पादन यानि 378 लाख टन के हिसाब से यह खरीद 14 फीसदी के करीब बनती है।
इस खरीद से उत्तर प्रदेश के करीब 10 लाख किसानों को लाभ हुआ और लाभान्वित किसानों की संख्या के हिसाब से उत्तर प्रदेश देश में दूसरे नंबर पर रहा।
जिस राज्य में 2.33 करोड़ किसान पीएम किसान से सहायता पा रहे हों और उन पर आश्रित खेतिहर आबादी 12 करोड़ से अधिक हो वहां यह खरीद कुछ कहानी कहती है।
इस बार की खरीद में मध्य प्रदेश के 17 लाख किसानों को फायदा हुआ, जबकि सबसे अधिक गेहूं बिक्री वाले पंजाब के 8.83 लाख और हरियाणा के 7.60 लाख किसानों ने गेहूं बिक्री की।
अगर छत्तीसगढ़ के बीते सीजन के धान किसानों की संख्या देखें तो वहां 22 लाख किसानों से धान खरीदा गया था। इसमें अधिकतर छोटे और सीमांत किसान शामिल थे।
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद 50 लाख टन से अधिक गेहूं खरीद का आंकड़ा दूसरी बार पार हुआ है।
2020-21 में राज्य में केवल 35.76 लाख टन गेहूं खरीदा गया था। 2016-17 के बाद अब तक के गेहूं खरीद के आंकड़ों को देखें तो मध्य प्रदेश 39.92 लाख टन से 129.42 लाख टन खरीद तक पहुंच गया।
पंजाब और हरियाणा तो खैर गेहूं खरीद में सबसे आगे हैं ही।
एमएसपी पर गेहूं की सरकारी खरीद 10 राज्यों में और धान खरीद सबसे अधिक 23 राज्यों में होती है। इस पर ही भारत सरकार की खाद्य सुरक्षा टिकी है। सरकार को 81 करोड़ भारतीयों को अगर कोरोना में राशन देना है तो खरीद तो बढ़ानी होगी।
निजी कारोबारियों के कंधों पर यह काम सस्ता नहीं पड़ेगा। और इसमें भी भारत में खाद्य सुरक्षा की धुरी पांच दशक से पंजाब औऱ हरियाणा बने हुए हैं। लेकिन 2020 में पहली बार मध्य प्रदेश ने गेहूं खरीद में पंजाब को पछाड़ दिया।
जबकि वहां पंजाब और हरियाणा की तरह भारी सरप्लस अनाज नहीं होता। फिर भी पंजाब की व्यवस्था का अनुसरण करके मध्य प्रदेश ने खरीद केंद्रों की संख्या में 298 फीसदी की बढोत्तरी की और छोटे और सीमांत किसानों से गेहूं खरीद में ऐतिहासिक सफलता पायी।
ऐसी काम उत्तर प्रदेश में भी होना असंभव नहीं है। लेकिन जब मध्य प्रदेश ने इतिहास बनाया तो देश में सबसे अधिक 5500 खरीद केंद्र खोलने के बाद भी 55 लाख टन गेहूं खरीद के लक्ष्य से उत्तर प्रदेश पीछे रहा और 35.77 लाख टन गेहूं की खरीद ही कर पाया।
इस बार की खरीद चुनावों से संबंधित भी है क्योंकि अगली गेहूं खरीद चुनाव के बाद ही होगी।
हाल में भारत सरकार ने 2021-22 के लिए खरीफ फसलों के एमएसपी में शानदार बढोत्तरी का दावा किया लेकिन किसान संगठनों ने इसे निराशाजनक माना।
सामान्य धान का एमएसपी 1868 रुपये प्रति कुंतल से बढ़ाकर 1940 और ए ग्रेड का 1960 रुपए किया गया. अगर डीजल, खाद, बीज की महंगाई को जोड़ लें तो दोनों श्रेणी में 72 रुपये की यह बढोत्तरी 50 फीसदी की जगह केवल चार फीसदी बैठती है।
पिछले सीजन की तुलना में मक्का पर केवल 20 रुपये, सोयाबीन पर 70 रुपये, मूंग पर 79 रुपए और रागी पर 82 रुपये की बढोत्तरी की गयी है।
सबसे अधिक बढोत्तरी 452 रुपये तिल पर हो जो करीब 6.6 फीसदी बैठता है वहीं उड़द और अरहर का एमएसपी 300-300 रुपये पांच फीसदी बढ़ोतरी वाला है।
भारत के समग्र कृषि परिवेश को देखें तो देश में 10 शीर्षस्थ फसलों में गन्ना, धान, गेहूं, आलू, मक्का, प्याज, टमाटर, चना, सोयाबीन और बाजरा आता है। लेकिन एमएसपी पर खरीद मुख्यतया धान और गेहूं पर केंद्रित है और बाकी फसलें भगवान भरोसे हैं।
सरकारी खरीद से लाभान्वित किसानों के आंकड़े भी चिंताजनक ही हैं।
2019-20 में एमएसपी पर सबसे अधिक करीब 1.24 करोड़ किसानों से धान औऱ 35.57 लाख किसानों से गेहूं खरीदा गया।
जिस देश में 14.65 करोड़ भूजोतों वाले किसान हों वहां सरकारी खरीद से कपास के 21.50 लाख किसान, दलहन के 11 लाख किसान और जूट के महज 3744 किसानों को लाभ पहुंचे तो इसे क्या माना जाये।
सरकार रबी और खरीफ के 22 फसलों की एमएसपी घोषित करती है लेकिन अपने तीन चौथाई उत्पादों को किसान घाटे में बेचने को विवश हैं। 2002-03 से 2017-18 के बीच 1340.02 मिलियन टन गेहूं उत्पादन हुआ जिसका 26.77 फीसदी यानि 358.82 मिलियन सरकार ने खरीदा।
वहीं इस अवधि में चावल उत्पादन कुल 1557.75 मिलियन टन हुआ जिसमें से 31.30 फीसदी या 487.60 मिलियन टन सरकार ने खरीदा।
2015-16 से 2018-19 के दौरान चार फसल मौसम में एमएसपी पर सरकारी खरीद से धान बिक्री में कुल तीन करोड 20 लाख किसान लाभान्वित हुए जबकि गेहूं खरीद से मात्र एक करोड़ 27 लाख किसान मात्र।
इसकी तुलना में बाकी फसलों की खरीद नगण्य रही।
दालों की खरीद के लिए बड़ा अभियान चलाने के बाद भी इन तीन सालों में देश भर से कुल 54 लाख किसानों को फायदा पहुंचा, जिसमें से 29 लाख किसानों से दाल खरीद 2017-18 में हुई जब दालों की कीमतें आसमान पर पहुंच गयी थी। लेकिन 2018-19 में यह संख्या घट कर 14.30 लाख किसानों तक हो गयी। दालों में अरहर की खेती करने वाले कुल 22.09 लाख किसान तीन सालों में लाभान्वित हुए। यह खरीद ऊंट के मुंह में जीरा कहा जा सकता है। (जारी )
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