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भाषाओं को मारता भाषा का सामंतवाद

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महेंद्र पांडेय

जमैका की संसद का एक सख्त नियम है। वहाँ कोई भी सांसद केवल सामान्य अंग्रेजी या जिसे ‘किंग्स इंग्लिश’ कहते हैं, उसमें ही बोल सकता है। किसी भी सूरत में स्थानीय भाषा का प्रयोग संसद के भीतर कोऊ सदस्य नहीं कर सकता|

हाल में ही विपक्षी दलों द्वारा चयनित संस्कृति और सूचना मामलों की प्रवक्ता, संसद सदस्य नेकीशा बरछेल ने संसद के अधिवेशन के दौरान अपनी बारी में अपने भाषण की शुरुआत स्थानीय जमैकन भाषा में करने का प्रयास किया।

लेकिन एक वाक्य के बाद ही स्पीकर, जूलिएट हॉलनेस जो प्रधानमंत्री की पत्नी भी हैं, ने उठ   कर जमैकन भाषा में बोलती संसद सदस्य को वार्निंग दी और कहा कि आगे भी अगर वे जमैकन बोलती रहीं तो उन्हें वक्तव्य देने से रोक दिया जाएगा|

इसके बाद नेकीशा बरछेल ने अंग्रेजी में बोलना शुरू किया और स्पीकर की तरफ घूमते हुए कहा कि, संसद के नियम उन्हें अच्छी तरह मालूम हैं। पर क्या यह अच्छा नहीं होता कि मैं जिस संस्कृति के बारे में बात कर रही हूँ उसकी भाषा का ही इस्तेमाल करूँ ताकि इस संस्कृति से जुड़े लोग उसे सीधे समझ पाएं|

इस घटनाक्रम के बाद से जमैका में भाषा को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है|

एक इंटरव्यू में सांसद नेकीशा बरछेल ने कहा कि जमैका में अंग्रेजों की गुलामी और उपनिवेशवादी मानसिकता इस कदर हावी है कि हम अपनी भाषा ही भूलते जा रहे हैं|

संसद में सदस्यों को वैसे ही कपड़े पहनने पड़ते हैं, जैसे ब्रिटिश पार्लियामेंट में पहने जाते हैं|

इन कपड़ों यानी विग, बो और लंबे चोगे को जमैका की गर्मी में बर्दाश्त करना एक सज़ा जैसा है|

संसद में हर सप्ताह पहले सत्र की शुरूआत में ब्रिटेन के राजा के सम्मान में एक प्रार्थना सबको बोलनी पड़ती है, जिसका मतलब शायद ही कोई समझता हो| बरछेल के मुताबिक, हर जगह की अपनी मर्यादा होती है, कानून होता है, पर समय के साथ ये कानून बदले भी जाते हैं। आज भी हम अंग्रेजों की चाटुकारिता में ही भरोसा करते हैं|

उनका कहना था कि जब चुनाव होते हैं तो सभी उम्मीदवार जनता के बीच स्थानीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं, पर चुनाव जीत कर संसद में पहुंचते ही भाषा बदल जाती है।

वहां वे अंग्रेजी बोलते हैं| संसद में जो जनता के मुद्दों के नाम पर बहस होती है, उसे स्थानीय जनता में बहुत से लोग समझ भी नहीं पाते|

नेकीशा बरछेल ने यह भी कहा कि जमैका खेलों और सांस्कृतिक गतिविधियों में बहुत आगे है|

हमारे खिलाड़ियों और कलाकारों ने जमैकन भाषा को पूरी दुनिया तक पहुंचाया है, पर अपनी संसद के भीतर ही यह भाषा प्रतिबंधित है|

उनके मुताबिक, जमैकन भाषा टूटी-फूटी अंग्रेजी की तरह है इसलिए दुनिया को लगता है कि हम अंग्रेजी नहीं सीख पाए इसलिए ऐसी भाषा बोल रहे हैं। यह गुलामी वाली मानसिकता है|

जमैकन भाषा का कुछ अंदाजा, क्रिकेटर क्रिस गेल की भाषा से लगाया जा सकता है|

जमैका में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में स्थानीय भाषाएं खतरे में हैं| वर्ष 1950 से अब तक 244 भाषाएं पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं और अगले 40 वर्षों के दौरान इससे तीन-गुना अधिक भाषाओं के पूरी तरह खत्म हो जाने का अंदेशा है|

असल में, भाषा के प्रति हम उदासीन रहते हैं।

दुनिया जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों और इतिहास के विलुप्त होने की बात करती है, उस तरह की चर्चा भाषा के बारे में नहीं की जाती|

‘हाउ टू किल अ लैंग्वेज’ नामक पुस्तक की लेखिका, सोफिया स्मिथ गलेर, के अनुसार भाषाओं के सबसे बड़े डेटाबेस, एथनोलॉग, में लगभग 7000 भाषाओं के बारे में बताया गया है। इनमें से लगभग 44 प्रतिशत भाषाएं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं|

ध्यान रहे, एक देश एक भाषा वाली मानसिकता ने भी स्थानीय भाषाओं को बहुत नुकसान पहुंचाया है| हमें लगता है कि फ़्रांस में सभी फ्रेंच और चीन में सभी लोग मेनडेरीन बोलते हैं, पर ऐसा नहीं है| इस मानसिकता के कारण स्थानीय भाषाएं दम तोड़ रही हैं| स्थानीय भाषाओं के मरने से परंपरागत और पीढ़ियों द्वारा सहेजा हुआ स्थानीय ज्ञान भी विलुप्त हो रहा है| भाषा हमारी चेतना और मस्तिष्क से भी जुड़ी है|

कनाडा में एक अध्ययन में देखा गया कि जिन क्षेत्रों में 50 प्रतिशत या अधिक आबादी स्थानीय भाषा में संवाद करती है, वहाँ आत्महत्या की दर दूसरे स्थानों की तुलना में 15 प्रतिशत ही है|

ऑस्ट्रेलिया में स्थानीय भाषा का स्वास्थ्य और आयु से गहरा संबंध देखा गया है| आजकल पश्चिमी देशों में शरणार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है| बे

हतर जिंदगी की तलाश में दूसरे देशों में पहुंचे लोगों के लिए अपनी भाषा छोड़ कर नई भाषा अपनाना सबसे बड़ी समस्या है|

माना जाता है कि प्रवासी लोगों की तीसरी पीढ़ी नई भाषा में पूरी तरह से दक्ष हो पाती है| मगर इस दक्षता के पीछे उनकी अपनी भाषा तड़पती रहती है।

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