ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को भेजे गए जीएसटी के कारण बताओ नोटिसों को सुप्रीम कोर्ट ने वैध बताया है।
अदालत ने इन कंपनियों पर जीएसटी लगाने के सरकारी फैसले के खिलाफ दायर की गईं याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि गेमिंग प्लेटफॉर्म पर जमा होने वाली कुल राशि पर 28 फीसदी टैक्स वसूलना संवैधानिक रूप से गलत नहीं है।
असल में, अगस्त 2023 में जीएसटी काउंसिल ने ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्मों पर लगने वाले दांव की कुल राशि पर डीएसटी लगाने का फैसला किया था।
कई गेमिंग कंपनियों ने इसके विरुद्ध अलग-अलग कई हाईकोर्टों में अपील की। मगर फिर केंद्र की गुजारिश पर सुप्रीम कोर्ट ने नौ हाईकोर्टों में चल रहे सभी मामलों को अपने पास मंगा लिया था।
काउंसिल के फैसले के बाद संबंधित कंपनियों को कम टैक्स भुगतान के आरोप में नोटिस मिले। इनमें कुल राशि करीब 1.12 लाख करोड़ रुपये है। जीएसटी कानून के तहत टैक्स डिमांड पर 100 फीसदी पेनल्टी भी लगती है, जिसे जोड़ कर इन कंपनियों की कुल देनदारी करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये हो सकती है।
बहरहाल, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ का कहना था कि ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म केवल कोई मध्यस्थ नहीं हैं, बल्कि उन्हें जीएसटी व्यवस्था के तहत कर-योग्य सप्लायर माना जाएगा।
अदालत ने कहा कि ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी गतिविधियां जीएसटी कानून के दायरे में आती हैं, इसलिए इन पर टैक्स वसूलना सही है। इतना ही नहीं, पीठ ने इस टैक्स को पिछली तारीख से वसूलने को भी सही ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भले ही इन खेलों में स्किल की जरूरत होती हो, राज्य सरकारों को ऑनलाइन मनी गेम्स पर प्रतिबंध लगाने का पूरा अधिकार है।
ऐसा कह कर हुए अदालत ने तमिलनाडु और कर्नाटक सरकार की अपीलों को स्वीकार कर लिया है। साथ ही उसने मद्रास हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया जिन्होंने ऑनलाइन गेमिंग पर दांव लगाने पर पाबंदी वाले कानूनों को असंवैधानिक बता कर खारिज कर दिया गया था।
पीठ ने जीएसटी अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे कानून के तहत इन कारण बताओ नोटिसों पर आगे कार्रवाई शुरू करें।
पीठ ने पिछले साल अगस्त में इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस विवाद की मुख्य वजह टैक्स गणना के तरीके थे।
जीएसटी विभाग इन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर जमा की जाने वाली पूरी रकम पर 28 फीसदी टैक्स चाहता था। पर गेमिंग कंपनियों की दलील थी कि केवल टूर्नामेंट आयोजित करने के बदले मिलने वाली कमीशन राशि पर ही टैक्स लगना चाहिए जो कि कुल जमा राशि का अधिकतम 15 फीसदी ही होता है।
इन कंपनियों ने यह भी दलील दी थी कि विभाग द्वारा मांगी गई राशि उनकी कुल कमाई से भी कहीं ज्यादा है। अगर यह टैक्स वसूला गया, तो हमें अपना कामकाज बंद करना पड़ेगा।







